Chidambaranand ji: guru, parents don’t do any bad

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Thetimesofcapital/24/11/2021/ Chidambaranand ji Mother, father and guru can never harm माता, पिता और गुरू कभी अहित नहीं कर सकते-चिदम्बरानंदजी

रतलाम,24 नवंबर। माता-पिता और गुरूजन कभी अहित नहीं कर सकते। हर व्यक्ति को अपने माता-पिता और गुरूजन का सम्मान करना चाहिए। भारतीय संस्कृति के ये संस्कार पूरे विश्व के लिए प्रेरणादायी है।

Chidambaranand ji Mother, father and guru can never harm
ये उदगार महामंडलेश्वर स्वामी चिदम्बरानंदजी सरस्वती ने शास्त्री नगर स्थित राजेश नंदलाल व्यास के निवास बासाब कृपा पर व्यक्त किए। स्वामी जी का यहां पुडीवाला बासाब परिवार द्वारा स्वागत किया गया। इस मौके पर उपस्थित धर्मालुजनों को संबोधित करते हुए चिदम्बरानंदजी ने स्वामी विवेकानंद से जुडें प्रसंगों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि माता-पिता और गुरू का सम्मान करने वाला कभी विफल नहीं होता। इसी प्रकार माता, पिता और गुरू का अपमान करने वाले कभी सफल नहीं होते। स्वामीजी ने अपने शिष्यों के साथ भजनों का रसपान भी कराया।

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Chidambaranand ji Mother, father and guru can never harm आरंभ में राजेश व्यास एवं परिवार के प्रमुख कैलाश व्यास ने स्वामीजी की अगवानी की। इस अवसर पर सुरेश व्यास, महेश व्यास, दिलीप व्यास, सोनू व्यास, रथिन व्यास, मनोहर पोरवाल, केबी व्यास,हरीश पुरोहित, महेश पुरोहित, रजनीश शर्मा, अरूण त्रिपाठी, निलेश पावेचा, विपीन पोरवाल, सि़़द्धार्थ जैन, विशाल पोरवाल, रितेश व्होरा, भरत भूषण, आशीष उपाध्याय, अमिताभ खाबिया आदि धर्मालुजन मौजूद रहे।

महामंडलेश्वर स्वामी चिदंबरनंद एक परिचय

Mahamandaleshwar Swami Chidambaranand

छह साल की निविदा उम्र में ही महाराज जी पहले से जानते थे की उनकी नियति आध्यात्मिकता में थी और आठ साल की उम्र में उन्होंने अपने गुरु की खोज की। वह बताते हैं कि उनके पिता एक साधक थे और उन्होंने अपने दिमाग को शुरु से ही संयोजित किया था कि उनका एक बेटा सेना में जायेगा दूसरा गृहस्थ होगा और तीसरे ने खुद को भगवान की सेवा में समर्पित किया होगा। जब उन्होंने यह सुना तो वह केवल छह साल के थे। यह सुनकर खुशी से कूद गए और उन्होंने कहा कि वे धर्म की राह पर ही चलेंगे।​

जीवन चरित्र
आठ वर्ष की आयु में उन्होंने अपने पिता से भगवा पहनने की अनुमति मांगी। उनके पिता ने उनका उत्साह देखकर सहमति दे दी। कुछ समय पश्चात् वह अपने पिता के साथ लखनऊ के पास एक तीर्थ स्थान नैमिसर्न्या में हरिहरनंद सरस्वती महाराज के आश्रम में गए। वहां प्रवचन के बीच गुरु जी ने अपने भक्तों से दान माँगा। उसके भक्तों ने उत्सुकता से भोजन धन भौतिक वस्तुओं और यहां तक ​​कि जमीन के दान का भी प्रस्ताव रखा किन्तु गुरु जी को वह सब नहीं चाहिए था। उन्हें तलाश थी एक शिष्य की। उनके पिता ने गुरु जी के मन का भाव समझकर अपने बेटे को उन्हें सौपने का वचन दिया।

महाराज जी बताते हैं की. जब मैंने अपने गुरु का चेहरा देखा और महसूस किया कि मेरा भाग्य वहां था तो मैं रोमांचित हो गया। दो साल बादए 10 वर्ष की उम्र में वह इसमें शामिल हो गए। स्वामीजी बताते हैं की यह उनके जीवन का सबसे ख़ुशी का दिन था। इसके बाद उन्होंने आश्रम में 5 साल बिताये और भगवद गीता उपनिषद और अन्य शास्त्रीय ग्रंथों की शिक्षाओं को ग्रहण किया और वेदांत की एक दृढ़ नींव हासिल की। उसके बाद उन्होंने आश्रम छोड़ दिया और लगभग 16 वर्ष की उम्र में स्वयं का आश्रम बनाया।
उनके कठोर तप और गहन साधना के माध्यम से उनके जीवन की एक शानदार भक्तिमय साधना शुरू हुई।

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